परमात्मा प्राप्ति किसे होती हॆ ?एक सुन्दर , अच्छी व शिक्षाप्रद कहानी है 🙏
एक ब्राह्मण था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा भक्त वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।
वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा--- "ब्राह्मणदेव मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"
परिवार को चाहने वाला ब्राह्मण बोला---"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हॆ।आपकी कृपा से सब प्रकार सुख-शान्ति हॆ। फिर भी मेरी एक ईच्छा हॆ कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरे पूरे परिवार को भी दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है ।"---भगवान ने ब्राह्मण को समझाया ।परन्तु परिवार को चाहने वाला ब्राह्मण भक्त भगवान से जिद्द् करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले,--"ठीक है, कल अपने पूरे परिवार को उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"
ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न. हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया।
अगले दिन पूरे परिवार मे निमंत्रण दे दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ चलना,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें।
दूसरे दिन ब्राह्मण समस्त परिवार और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। परिवार में से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी ब्राह्मण ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।
परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ परिवार के सदस्यों ने ब्राह्मण की बात को अनसुना कर तांबे के सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे,पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।
ब्राह्मण खिन्न मन से आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस बार भी बचे हुये परिवार के सदस्यों से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे।उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है । चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें !
इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया।अब तो परिवार में बचे हुये सारे लोग तथा ब्राह्मण के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।
अब केवल ब्राह्मण और उसकी ही शेष रह गये थे। ब्राह्मण भक्त ने अपनी पत्नी से कहने लगा---"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हॆ। भगवान के सामने सारी दुनियां कि दौलत क्या चीज हॆ?" सही बात है--पत्नी ने ब्राह्मण कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।
*कुछ दुर चलने पर ब्राह्मण व उसकी पत्नी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड हॆ।अब तो ब्राह्मणपत्नी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी,और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण ब्राह्मणी वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी।यह देख ब्राह्मण को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बड़े दुःखद मन से ब्राह्मण अकेले ही आगे बढते गये।
वहाँ सचमुच भगवान खडे उसका इन्तजार कर रहे थे।अपने भक्त को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा --"कहाँ है तुम्हारे स्वजन और तुम्हारे परिवार के सदस्य। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूँ।"
ब्राह्मण भक्त ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब भगवान ने ब्राह्मण भक्त को समझाया--
"देव जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हॆ, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती ओर वह मेरे स्नेह तथा आर्शिवाद से भी वंचित रह जाते हॆ।"
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जो प्राप्त है-उससे ही पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है, वही परमात्मा में व्यस्त है
जिसका मन परमात्म में व्यस्त है वही समस्तहै !!
स्मृति
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