उन्मुक्त गगन का सपना

 उनमुक्त उडुगां फिर एक दिन लिये नया सवेरा,
ना पग में बेड़ी आयेगी ना होगा पिंजरें का पहरा ,
 उम्मीद जगाकर  आँखों में ,मैं फिर बनाऊगाँ बसेरा
 तुम भले बाँध लो पंंख मगर,  मैं फिर देखुगाँ सपना,
इस पिंजरे का है घाव मगर ,
मैं करूंगा नियति को सुनहरा ,
हौसले को मेरे अभी, कहाँ देखा है तुमने इतना अभी,
ये शौर्य नहीं उम्मीद है मेरी, जो बढाती हैं सबंल मेरा,
जो बाधाएँ आज बनी, मज़बूत करेगी दोहरा ,
मैं फिर उडुगाँ उन्मुक्त गगन में लिए नया सवेरा ।''  
                                                                         स्मृति

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