संदेश

अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उन्मुक्त गगन का सपना

 उनमुक्त उडुगां फिर एक दिन लिये नया सवेरा, ना पग में बेड़ी आयेगी ना होगा पिंजरें का पहरा ,  उम्मीद जगाकर  आँखों में ,मैं फिर बनाऊगाँ बसेरा  तुम भले बाँध लो पंंख मगर,  मैं फिर देखुगाँ सपना, इस पिंजरे का है घाव मगर , मैं करूंगा नियति को सुनहरा , हौसले को मेरे अभी, कहाँ देखा है तुमने इतना अभी, ये शौर्य नहीं उम्मीद है मेरी, जो बढाती हैं सबंल मेरा, जो बाधाएँ आज बनी, मज़बूत करेगी दोहरा , मैं फिर उडुगाँ उन्मुक्त गगन में लिए नया सवेरा ।''                                                                            स्मृति

कोरोना ने मोड़ा जीवन को

' कोरोना की इस दुनिया ने, दुनिया को एसा झकझकोर दिया ,   हुई दुनिया उस खोफ़ की दिवानी ,  चलता फक़ीर दुनिया डुबो गया, संदेहा तो  था सब को,  संदेहा तो था सबको,  पर इतना निकट होगा,  यह  अंदेशा नहीं था,  क्योंकि बैठें हम,  सोचे हम,  थी जो मानसिकता इस जीवन में ,  यहीं सोच स्वीकार करी उस इश्वर ने,  आओ इस सोच को बदलें  इस समय को बदलने के लिए , फिर से अपनी सोच बदलें,   ध्यान करें अपने अंर्तमन का , उन पलों को फिर से सहेजें , जो छुट गए थे किसी कोने में' ॥                                                      स्मृति..... .                                                                          ...